परिवार का असली उद्देश्य
ओशो मानते हैं कि परिवार का उद्देश्य केवल जन्म देना और बच्चों की परवरिश करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां हर व्यक्ति स्वतंत्रता के साथ जी सके। माता-पिता को अपने बच्चों को केवल परंपराओं और नियमों से बांधकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें स्वतंत्रता देनी चाहिए ताकि वे अपने अनुभवों से सीख सकें।
परिवार स्वतंत्रता या गुलामी?
परंपरागत रूप से, परिवार को संस्कारों, कर्तव्यों और परंपराओं के आधार पर चलाया जाता है। बच्चे को शुरू से ही यह सिखाया जाता है कि उसे माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए, उनकी इच्छाओं के अनुसार चलना चाहिए।
ओशो कहते हैं कि यह गुलामी की तरह है, जहां व्यक्ति खुद के बारे में सोचने और निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। अगर परिवार एक खुला वातावरण दे, तो व्यक्ति आत्मबोध की ओर बढ़ सकता है।
माता-पिता की भूमिका
ओशो के अनुसार, माता-पिता को बच्चों पर अपने विचार, इच्छाएँ और डर नहीं थोपने चाहिए।
उन्हें केवल मार्गदर्शक बनना चाहिए, न कि नियंत्रक। जब बच्चा अपनी स्वतंत्रता और स्वाभाविक प्रवृत्तियों के साथ बढ़ता है, तभी वह एक संतुलित और आत्मनिर्भर व्यक्ति बनता है।
प्रेम पर आधारित परिवार
ओशो कहते हैं कि सच्चा परिवार वही है जो प्रेम पर आधारित हो, न कि डर और अनुशासन पर। अगर परिवार में प्रेम का माहौल होगा, तो बच्चे आत्मनिर्भर बनेंगे, और वे बिना किसी दबाव के अपनी राह चुनेंगे। एक प्रेमपूर्ण परिवार ही एक प्रेमपूर्ण समाज की नींव रख सकता है।
ओशो का दृष्टिकोण यह सिखाता है कि परिवार को बंधन नहीं बनना चाहिए, बल्कि यह एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां प्रेम, स्वतंत्रता और आत्मज्ञान को बढ़ावा मिले। अगर परिवार अपने सदस्यों को खुला माहौल दे, तो वे बेहतर और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
"परिवार का आधार प्रेम होना चाहिए, न कि नियंत्रण।" – ओशो
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